हरित क्रांति का अर्थ क्या होता है?| harit kranti ka arth | harit kranti kise kahate hain
हरित क्रांति से अभिप्राय यह कि कृषि को परम्परा तरीको को बदलकर तकनीकी परिवर्तनों की दिशा की ओर प्रवेश कराना है। कृषि क्षेत्र में हो रहे उत्पादन में वृद्धि करके अनेक प्रकार के बहुफसलीय कार्यक्रम एवं तकनीक और कृषि यंत्रों को अपनाकर एक हि वर्ष में कई फसलों का उगाने के लिए इस हरित क्रांति के कारण हि है। इस तरह से कृषि क्षेत्र में सभी तरीके से परिवर्तन लाकर कृषि क्षेत्र में उत्पादन में वृद्धि को हि हरित क्रांति कहा जाता है ।
हरित कान्ति के जनक कौन है |harit kranti ke janak|
कृषि में उत्पादन को बढाने के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन करने के उद्देश्य को अपनाने के इस स्थिति को हि हरित क्रांति का नाम दिया गया है इस प्रकार हरित क्रांति का सम्बंध कृषि क्षेत्र में उत्पादन क्ष्मता को बढाने एवं तकनीकी सुधार से है हरित क्रांति के जनक नॉरमोन ई. बोरलॉग को माना जाता है जो कि अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक थे और इन्हे नोबेल पुस्कार से सम्मानित किया गया था। ।
bharat mein harit kranti ke janak kaun hai
भारत में हरित क्रांति की शुरुआत कहां से हु
भारत में हरित क्रांति कब शुरू हुई?
भारत में हरित क्रांति का होने से शुरू होने से कृष परंपरागत रूप से निकलकर तकनीकी की दशा में प्रवेश गई है इसमें डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन का योगदान महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने भारतीय कृषि में नवीन प्रवृत्तियों का जन्म दिया है जिससे एक नए युग की शुरुआत हुई है और हरित क्रांति की शुरुआत भारत में वर्ष 1966 - 67 में हुई हुआ। भारत में हरित क्रांति का जनक डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन को माना जाता है।
हरित क्रांति के उद्देश्य |harit kranti ka uddeshya kya hai
हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य होता है कृषि के उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना ताकि अधिक से अधिक खाद्यान्नों का उत्पादन करके देश की आर्थिक आबादी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके इसी उद्देश्य का परिणाम है कि गेहूं के उत्पादन में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है और इसके साथ ही पश्चिमी उत्तर पंजाब हरियाणा क्षेत्र में किसानों की आय की स्टार में काफी वृद्धि हुई।
हरित क्रांति का प्रभाव
हरित क्रांति का कृषि अर्थशास्त्र पर प्रभाव कितना पडता है इसका वृद्धि का अनुमान अनेको आधार पर लगाया जा सकता है । हरित क्रांति से देश के कृषि क्षेत्र पर अधिक प्रगति हुई है।
इसके प्रभाव निम्नलिखित है –
1. कृषि उत्पादन में वृद्धि – हरित क्रान्ति की नीति से सबसे पहला प्रभाव कृषि क्षेत्र में उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई है विशेष रूप से गेहू, बाजरा, चावल, मक्का, ज्वार, में पहले से अधिक उत्पादन हुआ है। जिसके कारण खाद्यानों में भारत आत्मनिर्भर बन सका है ।
2. परम्परा स्वरूप में परिवर्तन - जो पहले कृषि क्षेत्र में परम्परागत तरीको से खेती जी जाती थी उनमें बदलाव करना । और खेती को व्यवसाय रूप मे देखा जाने लगा। जो कि पहले के लोग खेती सिर्फ पेट पालन के लिए करते थे।
3. कृषि बचतो में वृद्धि होना – उन्नत बीज, उत्तम सिचाई, मशीनो एवं साधनों के प्रयोग के कारण उत्पादन में वृद्धि हुई है जिससे किसानों में बचतो की मात्रा में वृद्धि हुई है । जिसके कारण देश के विकास के लिए काम में लाया जा सका है । और इसके साथ उद्योगिक क्षेत्र में भी बढावा मिला है ।
4. विश्वास – हरित क्रांति के प्रति किसान सरकार जनता आदि सभी लोगों में विश्वास जागृति किया है जिससे कि भारत आत्मनिर्भर हो सका है । और दूसरे देशों में निर्यात भी कर सकता है।
5. खाद्यानों के आयात मे कमी – हरित क्रांति को लाने से देश में आयात 1978 से 1980 के बीच पूर्ण रूप से बन्द कर किया गया था, लेकिन खाद्यानों कि कमी 1980 -81 होने के कारण अब कुछ खाद्यानों का आयात किया जाता है ।
6. रोजगार के अवसरों में वृद्धि –हरित क्रांति होने के कारण देश में रोजगारके अवसरों में वृद्धि हुई है । पानी, खादख् यंत्रों आदि के सम्बंध के कारण लोगों के रोजगार मिला है । और यंत्रों के मरम्मत के लिए उद्योगों में भी वृद्धि हुआ है ।
7. उद्योगो का विकास – हरित क्रान्ति होने के कारण कृषि कार्यों में लगने वाले यंत्रों का विकास प्रारंभ हुआ है । वर्तमान समय में कृषि एक व्यवसाय का रूप ले लिया है जिसके चलते ट्रेक्टर बनाने वाली कम्पनीया स्थापित हो गया है ऐसे हि रासायनिक खादों के अनेक कारखाने खोले गए है इसके साथ हि डिजल पम्प, थ्रेसर आदि जैसे कृषि क्षेत्र में लगने वाले साधनों का कारखाना स्थापित है जिससे चलते लोगे को रोजगार की सुविधा में वृद्धि हुई है ।
8. विभिन्न योजनाओं का प्रभाव – हरित क्रांति को क्रियान्वित होने के कारण उत्पादन में गहरा प्रभाव पडा । जिसके चलते हरित क्रांति द्वारा चलाई गई योजनाओं को ध्यान में रखकर सभी योजनाओं को संचालन किया है जिससे कि सभी योजनाऍ कृषि क्षेत्र में उत्पादन को बढानें में सहायक सिद्ध हुई है।
9. पूजी निर्माण में वृद्धि – हरित क्रांति के होने के कारण सभी किसानों की आय में वृद्धि हुई है जिसके कारण सभी किसान के पास बचत में भी बढोत्तरी हुई है बचत होने के कारण पूजी निर्माण की प्रक्रिया में बढी है इस पूजी को किसान पुन: कृषि के क्ष्ेात्र में लगाने के लिए बढावा मिलता है ।
10. जीवन स्तर पर प्रभाव – भारत की ज्यादातर जनता गरीब है जो अपनी आमदनी का अधिकांश भाग कृषि के उत्पादन क्षेत्र में लगा देता है । जिसका प्रभाव किसानों के बजट एवं जीवन स्तर पर भी पडता है । किन्तु हरित क्रांति के पश्चात अनाजो की उपलब्धता के कारण इनकी कीमतो को नियन्त्रित करनमें सहायता मिली है ।
हरित कान्ति में कौन कौन से तत्व सम्मिलित है| harit kranti ke tatva
1. रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग
हरित क्रांति के द्वारा कृषि क्षेत्र में उत्पादन की वृद्धि लाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है जिसका वर्तमान समय मे निरंतर प्रयोग से उत्पादन और आयात में निरंतर वृद्धि हुई है
2. उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग
हरित क्रांति के अंतर्गत अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग किया जाता है। भारत देश में लगभग 1966 से नए बीजों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। जिसमें गेहूं के सोना सेजो 64A, PV 18, बाजरे के लिए HVI, मक्का के गंगा 101, रंजीत, ज्वार के CSH-2 तथा चावल का IR आदि सम्मिलित है।
3. सिंचाई सुविधा का विस्तार
हरित क्रांति के आने से कृष के लिए सिंचाई सुविधा का बिस्तर में वृद्धि किया गया है इसके लिए सिंचाई के साधनों जैसे नहर नलकूप आदि की संख्या में वृद्धि की गई है और सिंचाई परियोजनाओं में छोटी या बड़ी पारी योजनाओं के रूप में बांटा गया है भारत में वर्ष 1965-66 में केवल 18 परसेंट क्षेत्र पर ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई गई थी जो वर्तमान समय में 40% से भी अधिक क्षेत्रों में उपलब्ध कराई गई है।
4. आधुनिक कृषि यंत्र एवं उपकरणों का प्रयोग
हरित क्रांति के अंतर्गत कृषि यंत्रों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया जाने लगा जैसे ट्रैक्टर ट्रेसर कंबाइन हार्वेस्टर तथा अन्य मशीनरी कृषि यंत्र आदि के साथ डीजल व सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण भी को भी बढ़ावा मिलने लगा सरकार द्वारा कृषि यंत्र खरीदने हेतु कम रेट पर ऋण उपलब्ध कराए गए तथा अनेक कृषि सेवा केंद्र खोले गए। जिससे किसान को परेशानी ना हो और अधिक उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो।
5. बहुफसली कार्यक्रम
इस कार्यक्रम के अंतर्गत एक ही भूमि पर एक वर्ष में एक से अधिक फसलों का उत्पादन करना अतः हरित क्रांति के माध्यम से फसलों के उत्पादन में वृद्धि करने हेतु बहु फसली कार्यक्रम को वर्ष 1967 68 में प्रारंभ किया गया।
6. भूमि सुधार कार्यक्रम
इस कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि उत्पादन को वृद्धि करना तथा हरित क्रांति को और अधिक मजबूत बनाने के लिए निम्न कार्य किए गए हैं
1 जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करना
2. काश्तकारी प्रथा में सुधार करने के लिए राज्यों में कानून पारित किए गए हैं
3. कृष जूतों की अधिकतम सीमा को निर्धारित करना तथा उनमें चकबंदी योजनाओं का लागू करना जिसके कारण से कृष के उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है।
7. भूमि परीक्षण कार्यक्रम
हरित क्रांति के अंतर्गत भूमि परीक्षण का कार्यक्रम शुरू किया गया है जिसके अंतर्गत सरकारी प्रयोगशालाओं के अलग-अलग क्षेत्र की मिशन पर शोध किया जाने लगा कि किस मिट्टी पर किस खाद एवं रासायनिक चीजों का प्रयोग किया जाए और भूमि परीक्षण से पता लगाया जाए कि इस मिट्टी को कृषि योग्य कैसे बनाएं।
8. कृषि शिक्षा और अनुसंधान
देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में सन 1960 में केवल एक कृषि विश्वविद्यालय ही था लेकिन उसके बाद कृषि समस्याओं को समाधान करने के हेतु कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद पर नए-नए अनुसंधान की ओर बढ़ता गया।
9. भूमि संरक्षण कार्यक्रम – कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढाने के लिए भूमि संरक्षण का कार्यक्रम अपनाया गया । जैसे कृषि योग्य भूमि के क्षरण को रोकना, उबड- खबड भूमि को समतल बना कर खेती करने योग्य बनाना । जिससे कि फसल की उत्पादन में वृद्धि हो सके ।
10. ग्रामीण में बिजली करण
कृषि क्षेत्र में उत्पादन को बढाने के लिए बिजली से संचालित यंत्रों एवं उपकरणों के प्रयोग के लिए बिजली की व्यवस्था करना जिससे कृषि के साथ – साथ ग्रामीण के जीवन स्तर में सुधार किया जाए। ग्रामीण में बिजली या विद्वुतिकरण की व्यवस्था सन 1969 में की गयी थी।
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